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राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर सभी पत्रकार एवं मीडियाकर्मी भाई-बहनों को बहूत-बहूत बधाई और ढेरों शुभकामनाएं.


यह दिवस लोगों की स्वतंत्र प्रेस के प्रति प्रतिबद्धता को और भी सुदृढ़ करता है.
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप म हम अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं, वहीं बदलते दौर के साथ इस क्षेत्र में नई चुनौतियां भी हमारे समक्ष आई हैं.
हमें विश्वास है कि हम भविष्य में भी अपने उच्च आदर्शों के अनुरूप समाज के हितों को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं निर्भीक ढंग से उठाते हुए जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए प्रयासरत रहेंगे और सरकार-प्रशासन व जनता के मध्य एक सेतु के रूप में कार्य करते रहेगें.एक बार आप सभी लोग को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर सभी पत्रकार एवं मीडियाकर्मी भाई-बहनों को बहूत-बहूत बधाई और ढेरों शुभकामनाएं.।

“Who is not, Afraid of Media?”
बात निकली भागलपुर से भी…तमाम मीडिया के साथी भी मौजूद रहे।
सुप्रीमकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में पिछले दिनों से ऐसे ही कुछ पहलुओं पर बहस चल रही है कि मीडिया और सोशल मीडिया समाज का आपस में संवाद करने का माध्यम हो। लेकिन इसमें सियासी दखल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मीडिया और सोशल मीडिया से कौन डरता है?
पिछले साल पूरी दुनिया में राजनीति से प्रेरित होकर 155 बार इंटरनैट की तालाबंदी की गई। इनमें से अकेले भारत में ऐसा 106 बार हुआ। दिल्ली की सॉ टवेयर फ्रीडम लॉ सैंटर नाम के डिजिटल राइट ग्रुप के अनुसार भारत में 2012 में सिर्फ 3 बार इंटरनैट शटडाऊन हुआ, जो 2013 में बढ़कर 5 बार हो गया। 2014 में 6, 2015 में 14, 2016 में 34, 2017 में 79, 2018 में 134 हो गया। शटडाऊन में अगले साल 2019 में कुछ कमी आई लेकिन यह फिर भी 106 बार हुआ। इसके आधिकारिक तौर पर दो कारण बताए गए-नागरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था। 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के कारण इंटरनैट शटडाऊन किए गए। कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद यह सेवा बंद की गई।
सवाल उठता है कि क्या इतने सारे शटडाऊन इसलिए किए जाते हैं ताकि सत्तारूढ़ दल की छवि धूमिल न हो, उजली छवि का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए किया जा सके? एक अध्ययन के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में 113 सीटें ऐसी थीं, जहां सोशल मीडिया का असर बहुत ज्यादा था। इनमें से 110 सीटें भाजपा ने जीती थीं। 2019 में ऐसी सीटों की सं या दोगुनी से ज्यादा करीब 250 हो गईं और भाजपा का यहां स्ट्राइक रेट 90 फीसदी से ऊपर रहा। 2016 में अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के ट्रंप की जीत के पीछे सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही। डैमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी किं्लटन की छवि सुनियोजित ढंग से एक रणनीति के अनुसार खराब करने का आरोप तब सोशल मीडिया पर लगाया गया था। सवाल कि क्या भारत में 2024 का चुनाव सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा?
कोरोना काल में सोशल मीडिया का इस्तेमाल 200 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। जानकारों का कहना है कि कोरोना काल के ट्वीट, फेसबुक पोस्ट, व्हाटसएप वीडियो मैसेज, मिमिक्री, यू-ट्यूब पर वीडियो आदि लंबे समय तक लोगों के साथ रहने वाले हैं। उसी तरह जैसे कोरोना काल से मिले दुख-दर्द तकलीफें त्रासदी के साथ जीना नया नार्मल है। सरकारों की भूमिका, उनका काम, उनके नेताओं के बयान, राजनीति सब याद आएगी। ऐसे में सरकार की नजर में बेलगाम होते सोशल मीडिया पर लगाम कसने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसलिए नए कानून बनाए गए हैं जिनके खिलाफ सोशल मीडिया कंपनियों ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया है।
फेसबुक को कोर्ट ने आड़े हाथ लिया है। दरअसल दिल्ली में पिछले साल हुए दंगों में फेसबुक की कथित भूमिका को लेकर दिल्ली विधानसभा की समिति ने फेसबुक को बातचीत के लिए बुलाया लेकिन फेसबुक ने कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। कोर्ट ने कहा कि फेसबुक भारत में खुद को प्लेटफॉर्म कहता है जिसका कंटैंट से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अमरीका में फेसबुक खुद को पब्लिशर कहता है ताकि फस्र्ट अमैंडमैंट का फायदा उठाते हुए उसे कानूनी संरक्षण भी मिल जाए और कंटैंट पर संपादकीय नियत्रंण भी बना रहे। इसी तरह ट्विटर को लेकर भी दिल्ली हाईकोर्ट का रुख सत हुआ है और उसने साफ कर दिया है कि अगर वे भारतीय कानूनों को नहीं मानेंगे तो कोर्ट का संरक्षण उन्हें हासिल नहीं होगा।
इन दिनों भारत सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच जंग छिड़ी है। सरकार के स त रवैये से नाराज इन कंपनियों ने मोदी सरकार को आलोचना सहन नहीं करने वाली और लेफ्ट विचारधारा को दबाने वाली सरकार बताते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने की कोशिश की है। उधर अन्य देशों की तरह भारत सरकार भी सोशल मीडिया कंपनियों पर निजता के अधिकार में ताक-झांक करने का आरोप लगाती रही है, सीधे-सीधे कहा जाए तो डाटा चोरी। इसके लिए भारत सरकार डाटा सुरक्षा कानून बनाने जा रही है। पहले माना जा रहा था कि 19 जुलाई से शुरू हो रहे मानसून सत्र में यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंप देगी और नया बिल इसी सत्र में संसद में रख दिया जाएगा लेकिन अब नया चेयरपर्सन होगा, चार नए मैंबर होंगे और नए सिरे से रिपोर्ट पर काम होगा लिहाजा मामला शीतकालीन सत्र तक टल गया लगता है।
डोनाल्ड ट्रंप से तो अभी भी सोशल मीडिया कंपनियों की तकरार चल रही है। फेसबुक ने उनका अकाऊंट ब्लाक कर रखा है। ट्विटर भी ऐसा ही कर रहा है। अब तो आपको इस सवाल का जवाब जरूर मिल गया होगा कि आखिर मीडिया और सोशल मीडिया से कौन डरता है।

भागलपुर बिहार

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